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Thursday, October 3, 2013

विलुप्त होती भारतीय भाषायें एवं कुछ शब्द( Bhartiya Languages are being Sabotaged )

हम अंग्रेजी भाषा के मद में चूर होकर स्वयं अपने आप को नष्ट कर रहें है । अंग्रेज अंग्रेजी भाषा का प्रचार प्रसार कर रहें है यह तो समझ आता है परन्तु हम भारतीय अपनी हिन्दी, तेलगू, तमिल, गुजराती, भोजपुरी, कन्नड, पंजाबी, उडिया, बंगाली, उर्दू  आदि भाषाओं का प्रचार न कर आग्ल भाषा का प्रयोग सुदृढ कर रहे हैं । इस कारण वर्तमान समय में भारतीय भाषाओं के अनेको अनेक शब्दो को इस अंग्रजी भाषा ने विलुप्त कर दिये है । प्रत्येक भारतीय भाषा में अंग्रजी भाषा ने अतिक्रमण या कहे आक्रमण कर दिया है। हम स्वयं भारतीय भाषाओं की रक्षा करने मे असमर्थ है । 

अंगेजी भाषा को धीमें विष के रूप में टी0 वी0, फिल्मों एवं शिक्षा व्यवस्था के व्दारा फैलाया जा रहा है । फिल्म वालों को इस पर विचार करना चाहिये  कि हिंगलिश, तिंगलिश, बंगलिश, कन्नडिश आदि सभी भारतीय भाषओं  में आप विकृति न लाये । भारतीय भाषा के शब्दों को हंसी का पात्र न बनायें । आप ऐसा करते है तो आप में भी जयचंद्र एवं मीर जाफर की आत्माये विराजती है । इन भाषाओं का केंद्र भारत है यदि यह भारत में समाप्त हो गयी तो फिर इन्हे कौन स्मरण करेगा । इनका अस्तित्व विश्व में समाप्त हो जायेगा । 

मै हिन्दी जानता हॅू और महसूस करता हॅॅू कि इन सभी शब्दों  के अंगे्रजी विकल्प लोग गर्भ के साथ उपयोग करते है । यह बहुत ही दुखद है । मै कुछ  हिन्दी भाषा के  शब्द प्रस्तुत कर रहा हुॅ जो धीरे धीरे हमारी दैनिक उपयोग कम होते जा रहे है । 

1. सारणी                     Table
2. मेज                          Table
3. पाठशाला                  School
4. श्रीमान                      Mr/Sir
5. महोदय/आदरणीय     Mr/Sir
6.श्रीमति                       Miss/Ms/Madam
7.महोदया                     Miss/Ms/Madam
8.मार्ग                           Road
9.प्रमाण पत्र                  Certificate  
10.कलम                      Pen
11.शब्दकोष                  Dictionary
12.सफलता                  Success
11.मूल्य                       Price
12.समय                      Time
13.वर्ष                          Year
14.मास                        Month
15.दिनांक                     Date
16.आंकडे                      Data
17.शतरंज                    Chess
18.न्यायलय                 Court   
19.बस्ता                       Bag
20.मित्र                         Friend
21.व्यंगचित्र                  Cartoon
22.पुस्तक                     Book
23.पुस्तकालय              Library
24.प्राचार्य                     Principal
25.शिक्षक                     Teacher
26.छात्र                         Student
27.पलक                       Parents
28.कार्यक्रम                  Event/Function
29.पलंग                       Bed
30.बागीचा                    Park/Garden
31.महाविद्यलया         College
32.विश्व विद्यालया     University
33. कक्षा                      Class
34.विषय                      Subject
35.द्वार                        Gate
36.यात्री वाहन               Bus
37.आंग्ल                      English
38.अभियांत्रिकी            Engineer
39.गहने                       Jewellary
40.धन्यवाद                  Thank You
41.स्वागतम्                  Welcome

यह शब्द मात्र संकेितक है । किसी भी देश का सम्मान एवं विकास में भाषा का बहुत ही महत्व होता है । इन अंग्रेजों  ने हिन्दी को राष्ट भाषा नही बनने दिया है ताकि अंग्रेजी भाषा का विकास एवं प्रसार बडी ही सरलता से किया जा सके । हिन्दी  भाषियों एवं अन्य भाषियों में फूट डालने का कार्य किया एव ंहम भारतीयों को भाषा के आधार पर लडाया । 


"संस्कृत भाषा को भारत की राष्ट भाषा की उपाधि प्राप्त होना चाहिये "
यह भाषा निविरोध रूप से भारत की राष्ट भाषा के रूप में स्वीकार की जा सकती है । संस्कृत वह शक्ति है जो भारत को विकास के शिखर पर पहुचा सकती है ।

मेरा आप सभी भारतीयों से निवेदन के अपनी भारतीय भाषाओं की ऐसे शब्दो की सूची बनाये  जो धीरे धीरे आम जनेा के बीच में गायब हो चुके है एवं उनका प्रयोग प्रारंभ करें अन्यथा आप अपने बच्चों को मातृ भाषा के ज्ञान से वंचित कर देगें । 

Friday, September 27, 2013

भारतीय समय ज्ञान ( India Time Caculation)


भारत में वर्षो बारह भागों मे विभक्त किया गया है । यह भारतीय प्रणाली सह़स्त्रों वर्ष प्राचीन है एवं निरंतर चलती आ रही है। इसमें इसमें कोई त्रुटि नही है। भारतीय मास निम्न लिखित है ।  

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3600 o’kZ
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12000 o’kZ
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71 fnO; ;qx
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निमेषः आंख की पलक  झपकने मे लगने वाले समय को निमेष कहते है ।

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Uk{k=ksa ds uke
अश्विनि 
भरणी
कृत्तिका
रोहिणी
म्रृगशीर्षा 
आर्द्रा 
 पुनर्वसु
पुष्य 
आश्लेषा 
मघा
पूर्व फाल्गुनी 
उत्तर फाल्गुनी 
हस्त 
चित्रा 
स्वाति 
विशाखा
अनुराधा
ज्येष्ठा
 मूल 
पूर्वाषाढ़ा 
उत्तराषाढ़ा
श्रवण 
धनिष्ठा 
शतभिषा
पूर्वभाद्र
उत्तरभाद्र
रेवती 




I wan to be Revolutioner ( मै क्रांतिकारी बनना चाहता हु)

भारत में ज्ञात आंकडो के अनुसार क्रांतिकारियों की संख्या  छः लाख से अधिक है, परन्तु मुझे लगता है कि यह वास्तविक आंकडे से बहुत कम है ।  भारत में क्रांतिकारी प्रेरक एवं बलिदान की स्मृति है। जिन्हे भारत में  श्रृटि के अंत तक स्मृति चिन्ह के रूप में याद रखा जायेगा एवं वह अगली पीडियों के लिये प्रेरणा स्त्रोत बने रहेंगें । मै बचपन से ही भारत के महान क्रांतिकारी के विषय में सुनता आ रहा हॅू । वह मेरे एवं मेरे जैसे कितने युवाओं के प्रेरणा स्त्रोत हैं, इसकी कोई कल्पना नही कि जा सकती है । क्रांतिकारीओं की प्रथम पीडी 1857 से प्रारंभ होती है । जिसके रचेयता ब्रम्हा श्री परमपूज्य मंगल पांडे जी को माना जाता है । जिन्होने ईश्वर के दिये हुऐ प्राणो को इसिलिये त्याग दिया कि आने वाली पीडी को उसके आहार मे गाय का मांस न खाना पडे । उस युग में क्रांतिकारीओं  का संबोधन पांडे कहकर किया जाता था । क्रांतिकारी केवल युवा ही हो सकते है  यह बिलकुल असत्य है । क्रांतिकारी बनने एवं आयु का कोई भी संबंध नही है । कम से कम भारत मे तो यह बाबू कुवंर सिह ने चोरसी वर्ष की आयु मे एवं बहादुर शाह जफर सिद्ध करके बता दिया था । अब बात आती है कि स्त्रियां क्रांतिकारी बन सकते है कि इस बात का तो कोई भी आंखे मूंद का स्वीकार कर सकता है उदारण अगर दूं तो पुस्तक का एक बंडल तैयार किया जा सकता है । अतः मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि क्रांतिकारी बननेे किसी आयु या वर्ग विशेष होना योग्यता नही है । 

मै क्रातिकारी तो बनना चाहता हूॅ परन्त समझ में नही आता कि क्रातिकारी कैसे बनूॅ । मुझे लगता है कि आजादी के पहले क्रांतिकारी बनना बहुत ही आसान था बस बंदूक उठायी अंग्रेजो के विरोद्ध लो बन गये क्रातिकारी । उस समय क्रातिकारियों की आवश्यता थी । इसिलिये सरलता से कांतिकारी बन जाया करते थे । परन्तु इस प्रकार का तर्क देते हुऐ मुझे स्मरण हुआ कि स्वतंत्रता के पहले भी सब भारत जन क्रांतिकारी नहीं हुऐ अतः यह क्रातिकारी कुछ अनोखों एवं महापुरूष ही बन सकते है । यह सबके बस की बात नही है । 
फिर विचार आया कि क्या वर्तमान समय में क्रांतिकारियों की आवश्यता है ।  कई मित्रों से विमर्श करने पर उत्तर सकारात्क एवं हाॅ मे है । देश स्वतंत्र होने के बाद अब क्रांतिकारी क्यों बना जाये । प्रश्न का उत्तर तो बहुत ही स्पष्ट एवं सर्व ज्ञात है । 


अब प्रश्न यह उठता है कि किस प्रकार कांतिकारी बना जा सकता है । क्या इसके लिये किसी विश्वविधालय मे पाठयक्रम चलता है । किस पाठयक्रम को एवं किस प्रकार की योग्यता की आवश्यकता होति है । यह पाठयक्रम कितने वर्षो तक चलता है एवं इसकी पढाई पर क्या व्यय होता है। किस विश्व विध्द्यालय में इसके पाठ्यक्रम चलाये जाते है । वर्तमान समय में प्रत्येक कार्य के लिये पाठयक्रम चलाये जाते है । वास्तव में इस प्रकार के किसी पाठयक्रम के विषय में कभी सुना तो नही है । 

फिर अगला प्रश्न आता है कि इसका स्कोप क्या है  इसमें मै कैसे अपना भविष्य सुरक्षित कर सकता हुॅ । क्रांतिकारी बनने के बाद मुझे क्या वेतन मिलेगा । क्या मे कभी उच्च प्राशासनिक पद पर पहुच पाउॅंगा। टी वी चलचित्र यंत्र पर देखकर मुझे लगता है क्या मै इससे प्राप्त होने वाले वेतन से अपना पंेसन प्लान एवं बच्चों के प्रीमियम भर सकॅूगा क्या । जैसे क्रिकेटरों के पास रूपयों की वर्षा होती है वेसै ही भी से धनवान व्यक्ति बन पाउगा। ऐसे न अनंत प्रश्न मेरे मन में हिलोरे मारते रहतें है ।

इन सारे प्रश्नों उत्तर मै न दूगा । वर्तमान क्रांतिकारियों की दशा अंगे्रजों के समय से भी अधिक दयनीय है । हमारा स्वतंत्र भारत का संविधान श्री भगत सिंह जी को क्रातिकारी नही मानता है । एक मंत्री श्री जय पाल रेडडी जी श्री विनायक दामोदर सावरकर जी का क्रातिकारी नही मानते है । नेता जी सुभाष चंद्र बोस की बेटी आज जर्मनी की नागरिक है भारत की नही है । उधम सिह जी जो जलियां वाला  बाग का बदला हाउस आॅफ कामन में ले चुकें है । महात्मा गांधी को हमने केवल स्वार्थ के लिये बापू माना और कहा, इस देस का संविधान उन्हे बापू नही कहता है। अर्थात आप समझ सकते है कि स्वतंत्रता के पहले एवं पश्चात् क्रांतिकारियों को सिवाय कष्ट के कुछ प्राप्त नही हुआ है । तो फिर एक  प्रश्न ओर आता है कि भारत में कोटि कोटि क्रांतिकारी कहां से उत्पन्न हुऐं है। उन क्रातिकारियों को नित नये विचारों से कौन सरावोर करता होगा। वे आज से 67 वर्ष पहले इतनी तीव्र अग्नि कहा से लाये एवं क्रातिकर स्वतंत्र भारत की ज्योति जलाने की च्येष्ठा की । 

यह तो माॅ भारती का प्रेम है कि जो किसी क्रांतिकारी बनने के लिये एक मात्र योग्यता है । यह बदले मे सम्मान, सुख, वैभव कुछ नही चाहता है । मात्र माॅ भारती के चरणों मे अपना जीवन न्यौछावर करना चाहता है । इनके लिये मृत्यु तो अंतिम सत्य होता है । जिसे ये लोग सहज की स्वीकार कर लेेते है । इसके बदले मे यह अपने परिवार के पेंसन की भी मांग नही करते है । 

हम सभी क्रांतिकारी बन सकते है बस थोडा स्वारूप बदल गया है । आपमें भी  माॅ भारती का रक्त है जो चंद्र शेखर आजाद एवं नाना साहेब की धमनियों में बहता है । आप में भी उन्ही  छः लाख क्रांतिकारियों की आत्माऐं है जो अब तक माॅ भारती के लिय प्राण न्यौछावर कर चुकें है मात्र आपको थोडी सी चिंगारी जलानी है वह महान  आत्माऐं जागृत होकर खुद ही कंा्रतिकारी बन जायेंगी । 



नागपुर यात्रा भाग एक प्रव्रजन प्रमाण पत्र (Nagpur Tour - Migration Certificate)

मै 22 सितम्बर 2013 दोपहर 12 बजे आसपास अपने घर से नागपुर की ओर निकल पडा । बस मार्ग अत्यंत ही विच्छित अवस्था में है इस बात की जानकारी मेरे सारे मित्रों ने मुझेे दी थी परन्तु लोहपथ गामिनी मे स्थान न मिलने के कारण मैने बस मार्ग से ही जाना उचित समझा। बस में आगे की ओर बैठ गया और प्रकृति का आनंद लेते हुऐ जबलपुर से नागपुर की ओर चल पडा । सिवनी पहुचने में मुझे पाॅच घंटों का समय लगा । सिवनी के पहले बंडोल में वाहल चालक परिवर्तित होना था नया चालत मदिरा पी कर मधुशाला में आनंद प्राप्त कर रहा था और वर्तमान चालक वाहन छोडकर घर चला गया अब क्या था मेरे नागपुर यात्रा का संघर्ष हो चुका था । बस आधे घंटे तक रूकी रही फिर वाहन चालक आया और सिवनी के लिये निकले। 
                                 
                  सिवनी मे बस स्टेण्ड मे मंगोडे अच्छे मिलते है । बीस रूपये में मंगोड खा कर नागपुर की ओर निकल पडे वाहन चालक बदल चुका था । नया वाहन चालक सुरक्षा के प्रति बडा सजग था । उसने तीस कि मी प्रति घंटे की गति से वाहन चलाया वर्तमान समय में तो बेलगाडी भी इससे अधिक गति में चलती है । खवासा सीमा में भारी जाम का सामना करना पडा । यह जाम नियमित रूप से लगता है । मार्ग तो इतना उत्तम की स्वयं ब्रम्हा भी विचार में आ जाये की इसका निर्माण कैसे किया गया होगा । रात को ग्यारह बजे मे नागपुर पहुॅचा । वहाॅ मेरा अभीष्ट मित्र श्री मनीष सनोडिया मेरा बडे ही उतावलेपर से मेरी प्रतीक्षा कर रहे  थे । परन्तु मेरे फोन की बैटरी जा चुकी और मेरा रात्रि भविष्य अधर मे लटक चुका था । परन्तु मेरे नागपुर बंधुओ के दूरभाष की सहायता से मैने श्री मनीष सनोडिया से संपर्क किया और वह मुझे नाग बाबा मंदिर में मिल गया । तद्ोरान्त दोनो मित्रों ने एक ही डब्बे से खाना खाया क्योंकि खाने वाली भाभी मेरा डिब्बा नही लायी थी । दोनो ने मिलकर हमारे सारे एम0 सी0 ए0 के सहपाठियों को स्मरण किया । यह स्मृति  कार्यक्रम बिना किसी भेद भाव के  हुआ इसमें मित्रों, शत्रुओं, नारी एवं पुरूषों की चर्चा समान्य रूप से हुई । 


                    अगले दिन हमें प्रव्रजन प्रमाण पत्र माग्रेसन सर्टिफिकेट  के लिये निवेदन देने जाना था । खाना आ चुका था हमने डब्बा खोला और डब्बे से दो मुर्गी के अंडे निकल आये, मै तो अंडे खाता नही हूॅ अतः मुझे बिना खाये ही प्रस्थान करना पडेगा ।  हम दोनो ने आॅटो से विश्वविध्द्यालय की ओर प्रस्थान किया,  शनिवार का दिन था इसिलिये कार्यालय जल्दी बंद होने की शंका थी । परन्तु श्री मनीष सनोडिया आॅटो वाले से भिड गये चिन्तन न्याय अन्याय का, आॅटो वाले ने दस के स्थान पर पद्रंह रूपये की मांग कर डाली सनोडिया जी का पारा उपर चड गया । श्री सनोडिया जी बहुत ही शांति प्रिय मानव है एवं मुझे उनके इस आचारण पर बडी ही हंसी आ रही थी । अंत में हमने आॅटो वाले को पद्रंह रूपये दे दिये और दूसरा आॅटो कर लिया। विश्वविध्द्यालय पहुचने पर हमने प्रव्रजन प्रमाण पत्र के लिये निम्न पत्रो को दिया 

1 स्थानांतरण प्रमाण पत्र की एक प्रति ( PhotoCopy of Transfer Certificate)                                            
2 एम0 सी0 ए0 अन्तिम खंड की अंकसूची की एक प्रति(MCA final semester Marksheet)
3 पाॅच सौ रूपये(500 Rs)

यह प्रव्रजन प्रमाण पत्र का महीने भीतर आपके स्थायी पते पर पहुचा दी जायेगी । 

                                           मैने भोजन किया एवं इसके पश्चात् हम वर्धा गांधी गा्रम की ओर लोह पथ गामिनी निकल चुके थे । वर्धा मे हमें प्रखर प्रवक्ता स्व0 श्री राजीव दीक्षित जी के यहाॅ जाना था । हम वहां पहुचे पर श्री प्रदीप दीक्षित जी से भेंट नही हो पायी । हम दोनो उनकी एक पुस्तक खरीदी और पुनः नागपुर आ गये । नागपुर मै हमने इंटरसिटी माॅल मे गां्रड मस्ती देखी । इसके पश्चात् हम दोनो अपने गृह में आ गये । सवेरे उठकर हम दोनो महाविध्द्यालय के दिनो कि चर्चा की और सभी सहपाठियों का स्मरण किया। मैने तीन बजे नागपुर से जबलपुर की ओर निकल चुका हॅू । श्री मनीष सनोडिया का अतिथि सत्कार के लिये धन्यवाद देता हूॅ । एक बाम्हण मि़त्र का आर्शीवाद सदैव तुम्हारे साथ रहेगा, दुधों नहाओ पूतों फलों, तुम्हे पुत्र रत्न की प्राप्ति हो और कन्या के रूप स्वयं लक्ष्मी तुम्हारे घर में अवतार ले ।   

                                         मै तीन बजे श्री मनीष सनोडिया के ग्रह से निकल पडा और निकलते ही बिल्ली मौसी ने मार्ग विच्छेद कर दिया । मैने इन अंध विश्वासों में मुझे नही पडना में तो आधुनिक हॅू और यह तो पुराने जमाने के आडंबर है ।और मैने आगे की प्रस्थान किया । गीतांजली पहुचकर चार बजे का नागपुर से जबलपुर जाने का टिकट लिया । एवं बस की प्रतीक्षा करने लगा बस सध्या छः बजे आयी दो घंटे देरी से । इसके पश्चात दो घंटे खवासा सीमा पर जाम मे बस खडी रही ।  सिवनी पहुचकर पता चला की बस तो सिवनी तक ही जानी है रात्रि  एक बजे मै और अन्य यात्री बस स्टेण्ड पर खडे थे । एक अन्य बस जाने के लिये तैयार थी बस में बैठते ही बस पंचर हो गयी अब तो मेरा खट्टा हो गया और मैने आगे जाने के अपेक्षा सिवनी में रात्रि विश्राम का निर्णय लिया एवं यहा हाटेल में रूक गया । हाॅटेल अमन में रूका किराया 350 रू0 एवं अर्ध रा़ित्र में जीरा चावन खाकर विश्राम किया । प्रभात होने  पर नित्य क्रियाओं से निवृत्त होकर हाॅटेल छोड दिया । बाहर निकलकर दो कचोडियों के स्वाद का आनंद प्राप्त किया । जिनकी मूल्य मात्र दस रू0 था ।  कचोडियों स्वादिष्ट थी । आगे बस में बैठ गये । बस 10ः10 में थी । यह बस संध्या 4ः50 में जबलपुर पहुची । यह मेरी नागपुर यात्रा का सारांश है । 

धन्यवाद

Thursday, August 22, 2013

बक्सर की यात्रा (Buxor)

15-जुलाई-2013 का सुबह आठ बज चुके है, सूर्यदेव बक्सर को अपनी  किरणों से सुशोभित कर रहें हैं श्री राव साहब की योजना के अनुसार हमें सवेरे नौ बजे बक्सर को देखने के लिये निकलना है । अभी सुबह के आठ बजे है एवं मुझें भूख लगी है । अतः मेरा मन स्टेशन पर लगे ठेलों की ओर जा रहा है । ठेलों पर लिटृटी बनाने की तैयारी की जा रही है । यह दो प्रकार से बनाई जा रही है ।  पहला तेल मे तलकर एवं दूसरी सिगडी पर । सिगडी एक प्रकार चूल्हा होता है । मेरा मन लिटृटी खाने के लिय ललाईत हो रहा है । इस सुरम्य अवसर का लाभ उठाते मैने लिटृटी खाने का निर्णय लिया है । एक प्लेट में चार लिटृटी एवं चने की सब्जी दी गई है । इसका मूल्य 12 है इसे खाने बाद पेट के सारे चूहे घोर निंद्रा मे चले गयें है ।

एक फल मुझे दिखा जो जबलपुर में नही दिखता है वह अमडा, अमडा का प्रयोग चटनी बनाने के लिये किया जाता है । इसका आकार आम के जैसा होता है । यह 16 रूपये किलो बिक रहा था एवं स्वाद में खटटा है । इसके बाद मैने पान खाया ।


यह बक्सर का देसी पान है। यहां दो पान एक साथ दिये जाते है । पानो का आकार बहुत छोटा है । एवं स्वाद बहुत बढिया । यह दो पान मात्र चार रू0 मे मिलते है । श्री राव साहब का दूरभाष आया कि वह प्रस्थान कर चुके है । उन्होने बताया कि बक्सर पापडी प्रसिद्ध है । मैने घर के लिये एक किलो पापडी खरीदी है । पापडी का मूल्य 120 से 200 रू तक है ।

श्री राव साहब मुझे भोजन कराने का हट कराने लगे, यह श्री राव साहब से मेरी द्वितीय भेंट थी अतः मै आश्चर्य में था । वह हट करके ले गये जो मेरे लिये अद्भुत एवं भययुक्त था । अतः मैने उनके यहाॅ भेाजन नही किया केवल मिठाई खाई । और अन्त मै हम दोनो बक्सर दर्शन को प्रस्थान कर चुके है । श्री राव साहब धार्मिक प्रवत्ति के है उन्होने मुझे निम्न स्थानो पर घुमाया ।

1 श्री रामजानकी आश्रम          2 श्री त्रिदण्डी जी महारज समाधी स्थल
3 ताडका वध स्थल                 4 नौलखा मंदिर
5 बाजार                                                

निम्न स्थान ऐसे है जिन्हे मै नही देख पाया हॅू
6 श्री राम रेखा घाट            7 राबर्ट क्लाईव का किला
8 गौशाला


बक्सर का वास्तविक नाम व्याघ्रसर है । जो शायद अंगे्रजो ने बिगाडकर बक्सर कर दिया होगा क्योकिं व्याघ्रसर का उच्चारण करना श्वेत प्राणि अंग्रेजो के बस का नही होगा । व्याघ्रसर नाम के पीछे एक दंत कथा यह है कि किसी ऋषि ने अन्य ऋषि को व्याघ्र होने का श्राप दे दिया एवं वह व्याघ्र - शेर बन गये परन्तु यहो स्थित झील एवं तालाब में स्नान करने के बाद वह पुनः मनुष्य स्वारूप मे वापस आ गये । अतः इसे व्याघ्रसर कहा गया । यह नगर अत्यंत पुराना है  यहा पर ऋषि विश्वामित्र ने तपस्या की थी  एवं श्री राम जी ने ताडका वध किया था । श्री शिव एवं पार्वती की तपो भूमि के रूप में भी व्याघ्रसर को जाना जाता है ।

यह नगर गंगा द्वारा दो भागों मे विभाजित किया गया है । एक भाग उत्तर प्रदेश एवं दूसरा भाग बिहार मे स्थित है ।  नगर के केन्द्र में 1857 क्रांति के नायक बाबू कंुवर सिह जी का पुतला लगा हुआ है । जो यहाॅ की गौरव गाथा स्वयं गाता है । यहॅा पर अंगे्रजी शासन काल का एक महत्वपूर्ण युद्ध सिराजुद्धदोला एवं रावर्ट क्लाईव की सेनाओ के बीच लडा गया था । इस युद्ध ने भारत के इतिहास  को बदल दिया था । यह युद्ध सिराजुद्धदोला हार गये थे । व्याघ्रसर में सफाई की थोडी सी कमी है । नगर के रिक्सो में बडे ही आनंद एवं कम पैसों मे घूमा जा सकता है ।

अब  दोपहर के 12ः30 हो चुके है । मेरी टेन का समय हो चुका है । श्री राव साहब 
घर की ओर कूच कर चुके है ओर मे होटल से प्लेटफार्म की ओर निकल चुका हूॅ । मेरी टेन प्लेटफार्म न0 दो पर आना है । टेन का नाम राजेन्द्र नगर टर्मिनल है जो पटना से चलकर मुम्बई जाति  है ।  मै टेन पर बैठकर जबलपुर की ओर चल चुका हूूॅं । रात्रि 12 बजे  मूझे जबलपुर स्टेसन पर उतारदिया है । मेरा मित्र सौरभ समैया स्टेसन पर आ चुका है ।

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Thursday, August 1, 2013

बदलते सपने (Changing Dreams)

जब मेरी आयु 3 वर्श की रही होगी तब निष्चिित ही मेरा सपना रहा होगा की मै अपनी माता पिता की तरह बडा हो जाउ । यह मुझे ठीक से याद नही है । मुझे तब पता भी नही होगा की सपना क्या होता है । परन्तु जब मै अपने चाचा जी को उनकी इच्छा अनुसार यहाॅ वहाॅ जाते देखता, मुझे खेलने नही मिलता, मुझे पढने के लिये कहा जाता, मुझे मन का खाना नहीं मिलता, मुझे मार या डांट खानी पडती तो मुझे लगता कि बडा कब तक हो जाउॅगा । उस अबोध ज्ञान, बचपन, चंचलता का यही सपना था ।

जब मेरी आयु लगभग आठ वर्श की हो गई तो मेरा सपना परिवर्तित हो गया । मेरा सपना भारतीय सेना में जाने का हो गया । मुझे लगता सेना भारत की सबसे महत्वपूर्ण मूल संस्था है और मुझे सही लगता था । मेरा पेतृक गा्रम बरेला जबलपुर  से भारतीय सेना के वाहन गुजरते रहते थे मै उन्हे देखकर, सावधान की स्थिति मे आ जाता और जय हिन्द की स्थिति की मे खडा हो जाता था । मेरा मन उस गोरवषाली वर्दी को पहनकर देष सेवा के लिये उत्प्रेरित रहता । परन्तु मात्र एक पुत्र होने के कारण परिवार ने सदा इस क्षेत्र मे मेरे लिये अरूचि दिखाई । कक्षा दसवीं मे मुझे चसमा लग गया और मेरे लिये यह एक सपना ही रह गया ।

अब मेरे सपने माता पिता के प्रभाव में आने लगे थे । दसवी और बारहवीं मे प्रथम श्रेणी में आने का दबाव था प्रतिषत जितने अच्छे होंगे, उतनी अच्छी नौकरी मिलने संभावना बढ जाती है । मैने इसे प्राप्त करने के लिये काफी प्रयास किया और सफलता प्राप्त की । इस समय सपनों से वंचित रहा । बारहवी उत्तीर्ण होने के पष्चात् चिताओं का समय प्रारंभ हो गया । सपने देखने के लिये समय ही नही था । बस दौडना है क्योंकि सभी दौड रहे। किसी भी प्रष्न के लिये कोई स्थान न था।

अंतिम समय में बी0सी0ए0 में प्रवेस ले लिया । यह सपना मुझे साफटवेयर इंजिनियर बनायेगा । यह एक ऐसा सपना था जो मैने कभी नही देखा परन्तु उसका सामना वास्तविकता कि रूप मे हो गया । अंधी दौड मे मनीश भाई षामिल हो गये और साफटवेयर इंजिनियर बन भी गये।  

समय के साथ सपनों ने भी करवट ले ली है अब सपने आवष्यकता के अनुरूप ही देखते है । यह सपने मूलत धन से संबंधित होते है। अब सपनों को हमारी बच्चे प्रभावित करने लगे हैं वह ही अब मूल आधार बन चुके है ।

यह तो मेरी एक छोटी सी मन की बात है। यह सपनो का खेल सभी के साथ होता है । सपनो का बनना बंद हो जाता परन्तु  सपनो का बनना कभी बंद न होगा । समय की मार सदैव सपनों पर पडती रहेगी । आप भी अपने सपने बतायें, बचपन के और पचपन के भी  ।

Wednesday, July 24, 2013

Types of Join (Oracle)

In Database, Join is an important concepts. Join is used to connect two or more tables and produce the results together.  These tables are connected by common column. I would not go into deep to explain join of the table. Blog will concentrate on "Type of the Join". I will try to cover all the type of the join in Oracle.






Thursday, July 18, 2013

Manish Sanodiya ki Shadi


प्रिय मित्रों,
                           आषीश के विवाह के बाद मेरा लक्ष्य मनीश सनोडिया की षादी मे उपस्थिति देना था । मेरी टेन जबलपुर से सुबह 12 बजे थी । मैने समान्य टिकट लिया और मै भोपाल के लिये निकल पडा । दो घंटे की यात्रा मुझे खडे खडे करनी पडी जो बहुत कश्ट दायक रही ।  संध्या को साढे छ बजे मै भोपाल पहुच गया बारात लग चुकी थी । वहाॅ पर मुझे हेमंत गुर्दे मिला जिसे मै पहचान नही पाया क्योंकि वह मोटा एवं बिना मुॅंछ का हो चुका है । वहीं मुझे डाॅं विवेक मिला जो हमारे साथ मे रहता था । मिलकर अत्यंत प्रसंन्नता हुई । दो . दो जाम लगने के बाद हम लोग बारात स्थल की ओर चल पडे,   साथ मे मनीश के अन्य मि़त्र भी थे ।

        लगभग दो घंटे नाचने के बाद काफी थकान हो चुकी थी । मश्तिश्क ने कार्य करना बंद कर दिया था । मुझे काॅलेज  के दिन याद आ गये । स्वागत होने के बाद मनीश की खिल्ली उडाने का दैार चलता रहा । अब जयमाला का समय पास आ चुका है और भाभी  जी ने हमारी जगह ले ली है । स्टेज पर मनीश बहुत डरा हुआ जान पड रहा है । मनीश और भाभी की उचाई एक जैसी है इसलिये जयमाला मे काई अडचन नही  हुई ।

      मै, हेमंत और अन्य मित्र स्टेज  से उतरकर पेट पूजा के लिये निकल पडे । खाने मे दाल, चावल, रोटी, पुडी, फलकी, मंगाडे, जलेबी, गुलाब जामुन, आइस क्रीम थे । मेने मा़त्र रोटी, चावल, दाल एवं जलेबी खायी । मनीश एवं भाभी खाने के लिये आ चुके थे । मनीश  ने भाभी को मात्र आधा गुलाब जामुन खिलाया जिसका मुझे बहुत दुख है ।गुलाब जामुन खिलाते समय मनीश  के हाथ कप रहे थे । वह ऐसे बैठा था जेसै दूध का धुला हो ।
इसके पश्चात भाभी चली गयीं । मनीश  भी वस्त्र परिवर्तन के लिये जा चुका  था ।



मेरे,  हेमंत, डाॅं विवेक के बीच पुरानी बातें याद की गई । मनीश  वापस आ गया था । लगभग दो बजे थे । हम लगभग एक घंटे साथ रहे । मनीश अन्य कार्यक्रमो के जा चुका था । हम सभी ने लगभग दो घंटे सो कर बिताये ।  मुझे , हेमंत, डाॅं विवेक की टेन थी । हम वापस अपने घरों की ओर निकल पडे । अनुभव बडा ही सुखद रहा ।